Thursday, 18 August 2011

चाहती हूँ मैं

 अभी सो कर उठी हूँ
मुंह नहीं धोया
फेंको
थोड़ी सी शराब
मेरे चेहरे पर.
उठाओ हंटर
और खींचो मेरे बदन पर
नई सीमारेखाएं .
सम्मानित करो
जूतों के ताज से.
मिट गयी है
मेरे गाल से
उँगलियों की छाप.
जलाओ सिगार  
और
बना दो गोरे बदन पर
मोटा सा तिल.
बची नहीं हैं
मेरे बिस्तर पर
सिलवटें .
बुलाओ अपनी पटरानियाँ.
...........................
सती होने से पहले
चाहती हूँ मैं
पतिव्रता होने के
सारे पुरस्कार.

Wednesday, 17 August 2011

कल गिनना मुझे

तुम निकल पड़े 
यूँ ही
 या देखा था पीछे
कम से कम उम्मीद तो होगी 
कि
आ रहा हूँ मैं भी 
मोमबत्ती लिए .
हो सकता है
विश्वास हो गहरा 
नैसर्गिक सिद्धांतों पर.
हाँ
मुझे भी आये थे 
"हिमालयन पार्लियामेंट" से 
ऋषियों के सन्देश.
मैं आऊँगा तो 
जरूर.
लेकिन मोटा भाई !
माफ़ करना 
मैं बिस्तर पे हूँ अभी 
टाँके लगे हैं 
पूरे  बदन पर .
यदि उठा अभी 
तो
फट जाएगा मेरा जिस्म 
और अनाथ हो जायेंगे
 मेरे बच्चे.
गलत मत समझो 
कभी- कभी ठहाके,चीख और क्रंदन
के बीच
होता है सिर्फ 
"मुद्रा" का फर्क.
बस थोड़ा सा इंतज़ार ...
आखिर,
 लम्बी बारिश  और बाढ़ के बाशिंदों को 
चलने की कोशिश से पहले
करनी पड़ती है 
अपने तलवों में 
नई खाल की 
प्रतीक्षा.
  

Tuesday, 16 August 2011

मिलते हैं प्रलय के बाद

जब फेस-बुक नहीं था
नहीं था कोई ब्लॉग
जब नहीं थे मोबाइल
 न था कोई टेलीफ़ोन .
तब भी थी दुनिया.... .
और थे रिश्ते .
यहाँ तक कि,
जब तुम नहीं थे 
और मैं भी नहीं 
तब भी थी दुनियां. .
दुनियां तो रहेगी. 
भले ही तुम 
न करो स्वीकार 
मेरी फ्रेंड रिक्वेस्ट. .
भाड़ में गया मैं 
और तुम्हारी कृपा. 
मैं डिलीट करता हूँ 
खुद को 
इन आसमानी तरंगों से 
और 
करता हूँ इंतज़ार 
प्रलय का . 

मुझे चाहिए कुछ सूचनाएं

यार !
तुम अफसर हो 
या
बावर्ची
जो चख लेते हो 
आवेदनों से
 खारे पानी का स्वाद.
क्या नहीं हुआ था 
तुम्हारा मेडिकल 
जो लेन-देन की बात से 
घुटता है 
तुम्हारा दम.
'मेन्टल' हो ....शायद.
पैदल चलते हो रोज 
मीलों 
न जाने किन चीज़ों के 
सत्यापन के लिए .
नादान इतने कि
पता ही नहीं 
नई पोस्टिंग कितने की है.
कैसी बुनावट है तुम्हारी 
जो नहीं पड़ता 
'प्रभावों' का प्रभाव. 
जनसूचना अधिकार के तहत 
मुझे चाहिए 
कुछ सूचनाएं... 
क्या है तुम्हारी
 करुणा का स्रोत? 
कौन सा  सूरज   
तुम्हें देता है 
इतनी ऊर्जा ?
किस चिड़िया से 
लाये हो 
निश्च्छल मन ?
वह लुहार
छेनी -हथौड़ी. ...
सारी सूचनाएं .
मेरे दोस्त !
अगर बिखर जांए 
गली-गली 
ये पर्चे 
 तो हम उगा सकते हैं
नए सूरज
 गली-गली.
.




Monday, 15 August 2011

मुझे फिक्र है तुम्हारी -मसीहा

व्यवस्था की 
चढ़ी हुई घाघरा नदी में,
चल रहे हैं 
भंवर.
दिखते हैं शांत 
 ऊपर से.....

लेकिन,
डाईन के नुकीले दांत 
जब काटेंगे 
धीरे धीरे 
कठोर स्पर
...डगमगाएगा
..तो ..
उसका आत्मविश्वास .
पड़ भी  सकती है 
 जोश में दरार. 
 कहीं...?
यदि 
बहने लगे 
मूल्यों के बोल्डर /
कट गयी 
उसकी आत्मा 
तो 
कैसे बचाऊंगा मैं 
उसके शरीर को 
बहने से
आज जो लड़की 
बेपरवाह 
लगी है 
औरों को बचाने में .

अन्ना की खातिर
किसी
एस.एम.एस . को
फारवर्ड करने से
कहीं ज्यादा
सार्थक है ....
अपने मोबाइल से
किसी "जुगाड़ " का
नम्बर डिलीट करना

झाड़ -फूंक
जादू- टोने से
भागता होगा
बेताल
डी. एन . ए. के
वर्णक्रम नहीं बदलते
जंतर - मंतर से ...