Wednesday, 17 August 2011

कल गिनना मुझे

तुम निकल पड़े 
यूँ ही
 या देखा था पीछे
कम से कम उम्मीद तो होगी 
कि
आ रहा हूँ मैं भी 
मोमबत्ती लिए .
हो सकता है
विश्वास हो गहरा 
नैसर्गिक सिद्धांतों पर.
हाँ
मुझे भी आये थे 
"हिमालयन पार्लियामेंट" से 
ऋषियों के सन्देश.
मैं आऊँगा तो 
जरूर.
लेकिन मोटा भाई !
माफ़ करना 
मैं बिस्तर पे हूँ अभी 
टाँके लगे हैं 
पूरे  बदन पर .
यदि उठा अभी 
तो
फट जाएगा मेरा जिस्म 
और अनाथ हो जायेंगे
 मेरे बच्चे.
गलत मत समझो 
कभी- कभी ठहाके,चीख और क्रंदन
के बीच
होता है सिर्फ 
"मुद्रा" का फर्क.
बस थोड़ा सा इंतज़ार ...
आखिर,
 लम्बी बारिश  और बाढ़ के बाशिंदों को 
चलने की कोशिश से पहले
करनी पड़ती है 
अपने तलवों में 
नई खाल की 
प्रतीक्षा.
  

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