Monday, 15 August 2011

मुझे फिक्र है तुम्हारी -मसीहा

व्यवस्था की 
चढ़ी हुई घाघरा नदी में,
चल रहे हैं 
भंवर.
दिखते हैं शांत 
 ऊपर से.....

लेकिन,
डाईन के नुकीले दांत 
जब काटेंगे 
धीरे धीरे 
कठोर स्पर
...डगमगाएगा
..तो ..
उसका आत्मविश्वास .
पड़ भी  सकती है 
 जोश में दरार. 
 कहीं...?
यदि 
बहने लगे 
मूल्यों के बोल्डर /
कट गयी 
उसकी आत्मा 
तो 
कैसे बचाऊंगा मैं 
उसके शरीर को 
बहने से
आज जो लड़की 
बेपरवाह 
लगी है 
औरों को बचाने में .

1 comment:

  1. वाह, स्वतन्त्रता दिवस पर इतनी अच्छी कविता के साथ ब्लॉग की शुरूआत...
    बधाई... और ढेर सारी शुभकामनाएं !!

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