यार !
तुम अफसर हो
या
बावर्ची
जो चख लेते हो
आवेदनों से
खारे पानी का स्वाद.
क्या नहीं हुआ था
तुम्हारा मेडिकल
जो लेन-देन की बात से
घुटता है
तुम्हारा दम.
'मेन्टल' हो ....शायद.
पैदल चलते हो रोज
मीलों
न जाने किन चीज़ों के
सत्यापन के लिए .
नादान इतने कि
पता ही नहीं
नई पोस्टिंग कितने की है.
कैसी बुनावट है तुम्हारी
जो नहीं पड़ता
'प्रभावों' का प्रभाव.
जनसूचना अधिकार के तहत
मुझे चाहिए
कुछ सूचनाएं...
क्या है तुम्हारी
करुणा का स्रोत?
कौन सा सूरज
तुम्हें देता है
इतनी ऊर्जा ?
किस चिड़िया से
लाये हो
निश्च्छल मन ?
वह लुहार
छेनी -हथौड़ी. ...
सारी सूचनाएं .
मेरे दोस्त !
अगर बिखर जांए
गली-गली
ये पर्चे
तो हम उगा सकते हैं
नए सूरज
गली-गली.
गली-गली.
.
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